Thursday, January 20, 2011

tireless...

समय के महीन धागों से
बुनी चादर अब
बूढी होती माँ से
बंधती नहीं,
खुलती जाती है
एक सिरे से
दूसरे सिरे तक,
जैसे अंतहीन सब्र में
मुंदी हुई आँखें
खुल गयी हों
किसी सपने के
खटके से.....

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